Operation Whitewash|DRDO और R&AW का एक संयुक्त अभियान।

Operation Whitewash
Operation Whitewash

एक conspiracy theory, जिसे codename Operation whitewash के नाम से जाना जाता है, जिसमें हिमस्खलन का कारण बनने के लिए Siachen की बर्फ को पिघलाने के लिए भारतीय KALI परियोजना का उपयोग शामिल है, हालांकि अभी भी इस विषय पर कोई मजबूत स्रोत उपलब्ध नहीं है। क्या है Operation Whitewash?, क्या यह DRDO और R&AW का एक संयुक्त अभियान है? या नहीं? जानिए इस आर्टिकल मे।


Gayari Sector avalanche

दुनिया के सबसे ऊंचे बैटलग्राउंड सियाचिन के गारी सेक्टर में 7 अप्रैल 2012 की सुबह एक बहुत बड़ा हिमस्खलन होता है, जिसमें पाकिस्तान आर्मी के लगभग 130 फौजी मारे जाते हैं। अगले ही दिन इस हिमस्खलन की खबरें पाकिस्तानी मीडिया में टॉप हैडलाइन बन जाता है, और कुछ न्यूज़ चैनल भारत पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि यह कोई प्राकृतिक हिमस्खलन नहीं, बल्कि भारत द्वारा किया गया एक लेजर बीम एक्सपेरिमेंट है। उनके अनुसार भारत बहुत समय से लेजर तकनीक से हिमस्खलन लाने का एक्सपेरिमेंट कर रहा था, जिसमें भारत सफल हो चुका है।

गायरी सेक्टर के हिमस्खलन के बारे में और भी जानिए – Wikipedia contributors. (2019, November 11). 2012 Gayari Sector avalanche. In Wikipedia, The Free Encyclopedia. Retrieved 11:36, January 13, 2020, from https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=2012_Gayari_Sector_avalanche&oldid=925631583

DRDO और R&AW का एक संयुक्त अभियान

डी.आर.डी.ओ यानी डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन और R&AW यानी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के एक ज्वाइंट ऑपरेशन जिसे नाम दिया गया था ऑपरेशन वाइटवॉश, आखिर क्या था यह ऑपरेशन वाइटवॉश और भारत ने कैसे इसे सफल बनाया?

Operation Whitewash क्या है?

एक conspiracy theory, जिसे codename Operation whitewash के नाम से जाना जाता है, जिसमें हिमस्खलन का कारण बनने के लिए ढलान की बर्फ को पिघलाने के लिए भारतीय KALI परियोजना का उपयोग शामिल है, हालांकि अभी भी इस विषय पर कोई मजबूत स्रोत उपलब्ध नहीं है, और भारतीय अधिकारी इस मिशन के विवरण को सार्वजनिक डोमेन में नहीं खोलना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास कुछ स्रोत हैं जो भारतीय KALI प्रोजेक्ट को साबित करते हैं।

कश्मीर में जवाहर टनल पर बर्फबारी

2009 में कश्मीर के जवाहर टनल के ऊपर बहुत ज्यादा बर्फ जमने के कारण टनल को बंद कर दिया जाता है कोई भी हादसा ना हो इसलिए बीआरओ यानी बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन को जल्द से जल्द बर्फ हटाने का काम सौंप दिया जाता है। काम को और भी तेजी से करने के लिए डी.आर.डी.ओ के LASTEC यानी लेजर साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर को भी बुलाया जाता है।

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R&AW के एक वरिष्ठ अधिकारी

दोस्तों जिस समय बी.आर.ओ और LASTEC मिलकर बर्फ हटा रहे थे, तब वहां R&AW का एक सीनियर फील्ड ऑफिसर भी मौजूद था R&AW का वह ऑफिसर देखता है कि, बर्फ हटाने के लिए LASTEC के टेट्रा व्हीकल्स का उपयोग किया जा रहा है जिसके पीछे एक विशालकाय आर्टिलरी गन जैसी कोई डिवाइस लगी है और जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है, KALI यानि Kilo Ampere Linear Injector.

KALI को देखते ही R&AW का वह ऑफिसर इतना उत्सुक हो जाता है कि मानो उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसी डिवाइस देखी हो। R&AW का वह ऑफिसर KALI के बारे में जानने के लिए LASTEC के वैज्ञानिकों से बात करने लगता है, LASTEC के वैज्ञानिक ऑफिसर को बताते हैं कि असल में वह आर्टिलरी गन जैसी दिखने वाली डिवाइस जिस पर KALI लिखा है, एक लेजर गन है जिसकी मदद से टनल पर जमी बर्फ में छोटे-छोटे हिमस्खलन लाकर बर्फ को हटाया जाएगा।

R&AW का वह ऑफिसर वैज्ञानिकों के इस बात को सुनकर आश्चर्यचकित हो जाता है, और सोचने लगता है कि क्या इस तकनीक का उपयोग युद्ध के क्षेत्र में किया जा सकता है या नहीं?, यही इससे छोटे-छोटे अवालांच लाए जा सकते हैं तो क्या इससे बड़े अवालांच लाए जा सकते हैं?

इस प्रकार कश्मीर से दिल्ली आते ही वह ऑफिसर अपने सीनियर्स को इस तकनीक के बारे में बताता है, लेकिन उसके सीनियर्स उस तकनीक को बेकार बताकर रिजेक्ट कर देते हैं, पर R&AW का वह ऑफिसर हार नहीं मानता और कई महीनों तक LASTEC और SAS यानि snow avalanche study establishment के साथ रिसर्च करने के बाद डिटेल प्रेजेंटेशन तैयार करता है और उस समय के R&AW के चीफ “संजीव त्रिपाठी” तक पहुंचा देता है।

एनएसए एम.के. नारायणन और रॉ प्रमुख संजीव त्रिपाठी

संजीव त्रिपाठी इस तकनीक को मान जाते हैं और उस वक्त के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर एम. के. नारायणन से बात करते हैं, उस समय NSA एम. के. नारायणन और R&AW चीफ संजीव त्रिपाठी बहुत अच्छे मित्र थे, इसलिए संजीव त्रिपाठी को NSA को यह बात समझाने और उन्हें मनाने में ज्यादा समय नहीं लगा।

कई दिनों के मेहनत के बाद NSA एम.के. नारायणन उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी मना लेते हैं और इस प्रकार प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाती है। और NSA एम.के. नारायणन को इस प्रोजेक्ट का हेड नियुक्त किया जाता है।

प्रोजेक्ट “Operation Whitewash” की शुरुआत

यहां से शुरुआत होती है प्रोजेक्ट के टीम को बनाने की प्रोजेक्ट के टीम को R&AW, डीआरडीओ के LASTEC, इंडियन आर्मी और इंडियन एयरफोर्स से चुना जाता है, और प्रोजेक्ट को नाम दिया जाता है “ऑपरेशन वाइटवॉश“। इसी दौरान R&AW और SAS के ऑफिसर्स 20,000 फीट ऊपर स्थित सियाचिन में इंडियन आर्मी के आर्मी बेस का दौरा करते हैं जहां से पाकिस्तान आर्मी के नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेड क्वार्टर साफ-साफ दिखाई देता है।

SAS के वैज्ञानिक पूरे एरिया की मैपिंग करके ऐसे ट्रिगर पॉइंट्स को चुनती है, जिससे कि एक्सपेरिमेंट के बाद पूरा का पूरा एरिया बर्फ के नीचे दब जाए और पाकिस्तान को एक भी सबूत ना मिले। ट्रिगर पॉइंट्स को चुनना और पूरे प्रोजेक्ट की प्लानिंग पेपर पर हो चुकी थी, लेकिन LASTEC के वैज्ञानिकों के सामने कुछ चुनौतियां थी, पहली चुनौती यह थी कि 10 टन से भी ज्यादा भारी KALI गन और उसको पावर देने वाली जनरेटर को 20000 फीट ऊपर सियाचिन में ले जाना, और दूसरा अगर KALI का प्रयोग जमीन पर किया गया, तो इसके वाइब्रेशन और आवाज से इसके आसपास की बर्फ धस सकती है जिससे कि KALI के पास मौजूद सभी ऑफिसर और वैज्ञानिक मारे जा सकते हैं।

इसलिए निर्णय लिया जाता है कि KALI का प्रयोग जमीन पर नहीं बल्कि एयर प्लेटफार्म यानी कि आसमान से किया जाएगा और जिसके लिए R&AW का एविएशन रिसर्च विंग (ARC), इंडियन आर्मी के दो विशालकाय प्लेन il-76 का उपयोग किया जाएगा।

दोनों il-76 प्लेंस को cattuck में मौजूद ARC के एयरबेस पर लाया जाता है जहां पर उन प्लेंस में KALI 50000w laser weapon को लगाया जाता है। यह KALI 50000w लेजर वेपन उस KALI gun से कई गुना शक्तिशाली थी जिसे R&AW के ऑफिसर ने जवाहर टनल पर देखा था।

दोनों il-76 प्लेंस में काली को लगाने के बाद इन दोनों प्लेंस को sarsawa एयर फोर्स स्टेशन पर ले जाकर पार्क कर दिया जाता है, जहां इनकी सुरक्षा के लिए इंडियन एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो को तैनात कर दिया जाता है।

इधर इंडियन आर्मी के सियाचिन पोस्ट पर एक ऑब्जरवेशन टीम पहले से ही मौजूद थी, जिन्हें हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग दिया गया था।

प्लान के अनुसार सब कुछ करने के बाद ऑपरेशन वाइटवॉश के लिए d-day चुना जाता है, 7 अप्रैल 2012 दोपहर के 12:00 बजे, इस ऑपरेशन के लिए दोपहर का समय इसलिए चुना जाता है, क्योंकि सियाचिन में ज्यादातर नेचुरल हिमस्खलन दोपहर के समय ही आते हैं, लेकिन क्योंकि यह ऑपरेशन दोपहर के समय एयर प्लेटफार्म से होना था, इसलिए polarisation और high-precision शूटिंग जैसे तकनीकी समस्या आ रहे थे, जिसे सुलझाने के लिए भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों की सहायता ली जाती है।

वैज्ञानिक प्रोजेक्ट की स्टडी करके सुझाव देते हैं कि इस ऑपरेशन को सुबह किया जाए या फिर शाम को उनके अनुसार इन तकनीकी समस्याओं का एकमात्र यही रास्ता था। प्रोजेक्ट के सभी लोग भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसार ऑपरेशन के समय को बदल कर सुबह के 4:00 बजे कर देते हैं। अब Operation whitewash 7 अप्रैल 2012 को सुबह 4:00 बजे होना था।

इस प्रकार डी-डे के दिन काली से लैस दोनों il-76 प्लेंस saraswa एयर बेस से उड़ान भरते हैं और सियाचिन में पहले से ही निर्धारित coordinates पर अपनी-अपनी पोजीशंस ले लेते हैं। इनके साथ साथ इंडियन एयर फोर्स का एक एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी airbak प्लेन और रिफिलिंग के लिए एक il-78 प्लेन भी इनके पीछे पोजीशन ले लेते हैं।

ऑपरेशन के दौरान किसी भी तरह के सिचुएशन के लिए सुबह के 2:00 बजे से ही, 6 मिराज फाइटर जेट और दो सुखोई फाइटर जेट पहले से ही il-76 प्लेन के आसपास के एरिया को स्कैन करना शुरू कर चुके थे।

इधर SAS के वैज्ञानिकों की एक टीम सेटेलाइट डाटा रिसेप्शन सेंटर और 3D terrain visualisation centre से मिली डाटा को विश्लेषक करने के बाद trigger points mark कर चुकी थी।

सभी वैज्ञानिक और R&AW के ऑफिसर और NSA आपस में कोआर्डिनेशन बनाए हुए थे और लगातार प्रोजेक्ट प्रोग्रेस और इंफॉर्मेशन प्रोजेक्ट के head, NSA Mk Narayanan तक पहुंचा रहे थे।

7 अप्रैल के सुबह के चार बजते ही iL-76 प्लेन में लगी kali gun 30,000 फीट की ऊंचाई से trigger points पर 100 % precision से laser shooting शुरू कर देती है। कुछ समय बाद सुबह के लगभग 5:40 पर सियाचीन में observation team को हिमस्खलन की आवाजें सुनाई देती है, पाकिस्तान के नॉर्दन लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर पर हिमस्खलन शुरु हो चुका था, जिसकी तेज़ी लगभग 3000 किलोमीटर प्रतिघंटा थी।

पाकिस्तान आर्मी इस avalanche को देखते ही अपने आर्मी के जवानों को अलर्ट करने की कोशिश करता है, लेकिन 3000 किलोमीटर प्रति घंटे की तेजी से गिरती हजारों टन बर्फ उनको कोई मौका नहीं देती। 10 से 15 मिनट में ही पाकिस्तान आर्मी का पूरा का पूरा हेड क्वार्टर 80 से 100 फीट मोटी बर्फ के नीचे दब जाता है।

पाकिस्तानी आर्मी के अनुसार इसमें उनके 124 फौजी मारे गए थे, लेकिन इंडियन आर्मी के अनुसार इसमें पाकिस्तानी आर्मी के 130 से भी ज्यादा जवान मारे गए थे। पाकिस्तान आर्मी के अनुसार नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर के ऊपर 80 फीट मोटी बर्फ की परत जम गई थी जिसे बड़े-बड़े डिगिंग मशीन भी नहीं हटा सकते।

काली के इस विनाशकारी दृश्य को देखकर डीआरडीओ के वैज्ञानिक भी भयभीत हो गए थे। ऑपरेशन वाइटवॉश siachen में पाकिस्तान के नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर के लिए एक बहुत बड़ा विनाश था, जिसे पाकिस्तान कभी भुला नहीं पाएगा। ऑपरेशन वाइटवॉश की सफलता के बाद से डीआरडीओ काली के एक छोटे कंपैक्ट मॉडल को विकसित करके इंडियन आर्मी को दे चुके हैं, जिसका प्रयोग इंडियन आर्मी किसी भी युद्ध स्थिति में कर सकता है।

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स्रोत