ऑपरेशन व्हाइटवॉश में il-76 विमान से लेजर हथियार बमबारी की कलात्मक चित्रण। | भारतीय सेना का विशाल आईएल -76 विमान जिसमें KALI 50000w लेजर हथियार लगा है।
चित्र 1: ऑपरेशन व्हाइटवॉश में il-76 विमान से लेजर हथियार बमबारी की कलात्मक चित्रण। | भारतीय सेना का विशाल आईएल -76 विमान जिसमें KALI 50000w लेजर हथियार लगा है।

जब एक विशाल हिमस्खलन ने दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान में 140 पाकिस्तानी सैनिकों और असैनिक ठेकेदारों को गहरी बर्फ में फँसा दिया, कुछ ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह प्राकृतिक हिमस्खलन नहीं है, बल्कि भारत द्वारा किया गया एक लेजर बीम प्रयोग है। उनके अनुसार भारत हिमस्खलन लाने के लिए लंबे समय से लेजर तकनीक का प्रयोग कर रहा था और इस बार भारत सफल हो गया है। जबकि कुछ अन्य लोगों ने कहा कि ग्लेशियर की बर्फ पर भारी मात्रा में कार्बन जमा होने और सौर विकिरण के बढ़ते अवशोषण के कारण अप्रत्याशित हिमस्खलन हुआ।

R&AW और DRDO का एक लेजर बीम प्रयोग या “ऑपरेशन वाइटवॉश” कोडनेम द्वारा जाना जाने वाला एक षड्यंत्र सिद्धांत, जिसमें हिमस्खलन लाने के लिए ढलान वाली बर्फ को पिघलाने के लिए भारतीय काली परियोजना का उपयोग शामिल है; ऑपरेशन वाइटवॉश(Operation Whitewash) क्या था? क्या यह DRDO और R&AW का संयुक्त अभियान था? या कुछ और, इस लेख में जानें।


गायरी सेक्टर हिमस्खलन(Gayari Sector Avalanche)

7 अप्रैल 2012 की सुबह, सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र के पास गायरी सेक्टर में एक विशाल हिमस्खलन से एक पाकिस्तानी सैन्य ठिकाना पूरी तरह से नष्ट हो गया था, जिसमें 140 पाकिस्तानी सैनिक और नागरिक ठेकेदार गहरे बर्फ के नीचे फंस गए थे। सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है। 29 मई 2012 को, पाकिस्तानी सेना ने घोषणा की कि इस हिमस्खलन में 129 सैनिक शहीद हुए और 11 नागरिक मारे गए, हालांकि अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार 130 पाकिस्तानी सैनिक शहीद हुए। यह सबसे खराब हिमस्खलन था जिसे पाकिस्तानी सेना ने कभी अनुभव नहीं किया था।

यह घटना जल्द ही पाकिस्तानी मीडिया में शीर्ष शीर्षक बन गई, और कुछ समाचार चैनलों ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह प्राकृतिक हिमस्खलन नहीं, बल्कि भारत द्वारा किया गया एक लेजर बीम प्रयोग है। उनके अनुसार, भारत हिमस्खलन लाने के लिए लंबे समय से लेजर तकनीक का प्रयोग कर रहा था और इस बार भारत सफल हो गया। जबकि कुछ अन्य लोगों ने कहा, “ग्लेशियर की बर्फ पर भारी मात्रा में कार्बन का जमाव और सौर विकिरण के बढ़ते अवशोषण, सियाचिन क्षेत्र के गायरी सेक्टर में अप्रत्याशित हिमस्खलन का मुख्य कारण है”

पाकिस्तान मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सियाचिन क्षेत्र में ट्रांस-बाउंड्री प्रदूषण के कारण ग्लेशियर बर्फ पर भारी मात्रा में कार्बन का जमाव हुआ था, जिससे तापमान में वृद्धि हुई और गायरी सेक्टर क्षेत्र में सौर विकिरण के अधिक अवशोषण के कारण बर्फ पिघला और जो हिमस्खलन का कारण बना।

हालाँकि, हिमस्खलन स्थल या हिमस्खलन स्रोत बेसिन के 15 किमी के भीतर कोई भारतीय सैनिक नहीं थे, और सियाचिन ग्लेशियर का कोई भी हिस्सा हिमस्खलन स्थल के 30 किमी के भीतर नहीं है, सियाचिन प्रणाली से 5000 से 7500 मीटर ऊंचे साल्टोरो रिज से अलग किया गया है। एक गैर-सरकारी संगठन के अध्ययन में भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा खराब अपशिष्ट संग्रह का पता चला, जो लगभग पूरी तरह से सियाचिन ग्लेशियर बेसिन में स्थित है, जो एक दिन में 1000 किलोग्राम कचरे का उत्पादन करता है जो ड्रम में पैक किया जाता है। कचरे के इन ड्रमों को एक साल में लगभग 4000 ड्रमों की दर से क्रेवेस (एक गहरी खुली दरार, विशेष रूप से एक ग्लेशियर में) में फेंक दिया जाता है। हालांकि, हिमस्खलन स्थल सियाचिन बेसिन के किसी भी हिस्से से 15 किमी पश्चिम में है, बिलाफोंड ला के ठीक नीचे गायरी नदी के पास, जिनमें से कोई भी सियाचिन ग्लेशियर प्रणाली से प्रवाहित नहीं होता या उससे नहीं जुड़ता।

गायरी सेक्टर के हिमस्खलन के बारे में और भी जानिए – Wikipedia contributors. (2019, November 11). 2012 Gayari Sector avalanche. In Wikipedia, The Free Encyclopedia. Retrieved 11:36, January 13, 2020, from https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=2012_Gayari_Sector_avalanche&oldid=925631583

ऑपरेशन वाइटवॉश(Operation Whitewash) क्या था?

कुछ अनौपचारिक स्रोतों और इंटेल के अनुसार, ऑपरेशन वाइटवॉश(Operation Whitewash) R&AW और DRDO का एक लेजर बीम प्रयोग था, जो संयुक्त रूप से DRDO और आर R&AW द्वारा आयोजित किया गया था। यह एक अत्यधिक गोपनीय ऑपरेशन था जिसे कोडनेम “ऑपरेशन वाइटवॉश” के नाम से जाना गया, जिसमें प्राकृतिक दिखने वाले हिमस्खलन पैदा करने के लिए ढलान वाली बर्फ को पिघलाने के लिए भारतीय KALI परियोजना का उपयोग शामिल है।

हालांकि, इस ऑपरेशन के लिए कोई मजबूत स्रोत उपलब्ध नहीं हैं, और भारतीय अधिकारी इस मिशन के विवरण को सार्वजनिक डोमेन पर नहीं खोलना चाहते हैं, इसलिए इसे एक षड्यंत्र सिद्धांत माना जाता है।

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  • DRDO: (डिफेन्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन) रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन। यह भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के अधीन एक एजेंसी है, जिसका काम सेना के अनुसंधान और विकास करना है। मुख्यालय दिल्ली, भारत में है।
  • R&AW: रिसर्च एंड एनालिसिस विंग। यह भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी है। एजेंसी का प्राथमिक कार्य विदेशी खुफिया, जवाबी आतंकवाद, प्रति-प्रसार, भारतीय नीति निर्माताओं को सलाह देना, और भारत के विदेशी रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाना है, जिसका मुख्यालय दिल्ली, भारत में है।
  • KALI: KALI का मतलब है किल्लो एम्पीयर रैखिक इंजेक्टर। यह एक रेखीय इलेक्ट्रॉन त्वरक है जिसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा विकसित किया जा रहा है। यह एक डायरेक्ट-एनर्जी हथियार है जिसे इस तरह से काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि अगर दुश्मन की मिसाइल को भारत की ओर लॉन्च किया जाए, तो यह रिलेटिविस्टिक इलेक्ट्रॉन बीम के शक्तिशाली पल्सेस को जल्दी से निकाल देगा और लक्ष्य को पूरी तरह से नष्ट कर देगा और ऑन-बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को भी नुकसान पहुंचाएगा। अनौपचारिक स्रोतों के अनुसार यह माना जाता है कि यह पहले से ही किसी छिपे हुए स्थान से चालू है या ऑपरेशन वाइटवॉश में परीक्षण किया गया था, लेकिन आधिकारिक तौर पर इससे अभी तक युद्ध-परीक्षण नहीं किया गया है क्योंकि ऐसी स्थितियां नहीं हैं जो भारत को अपने परिचालन अस्तित्व को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने के लिए मजबूर करें। हालाँकि 14 जुलाई 2018 को संसद ने सरकार से पूछा कि क्या सशस्त्र बलों में KALI 5000 को शामिल करने का कोई प्रस्ताव है, तो भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने लोकसभा में लिखित में जवाब दिया कि, “वांछित सूचना प्रकृति में संवेदनशील है और इसका खुलासा राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है” सरकार ने KALI लेजर हथियार के परीक्षण की कोई भी जानकारी देने से भी इनकार कर दिया।

ऑपरेशन वाइटवॉश की स्टोरीलाइन

कश्मीर में जवाहर टनल पर बर्फबारी

2009 में कश्मीर के जवाहर टनल के ऊपर बहुत ज्यादा बर्फ जमने के कारण टनल को बंद कर दिया जाता है कोई भी हादसा ना हो इसलिए बीआरओ यानी बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन को जल्द से जल्द बर्फ हटाने का काम सौंप दिया जाता है। काम को और भी तेजी से करने के लिए डी.आर.डी.ओ के LASTEC यानी लेजर साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर को भी बुलाया जाता है।

R&AW के एक वरिष्ठ अधिकारी

दोस्तों जिस समय बी.आर.ओ और LASTEC मिलकर बर्फ हटा रहे थे, तब वहां R&AW का एक सीनियर फील्ड ऑफिसर भी मौजूद था R&AW का वह ऑफिसर देखता है कि, बर्फ हटाने के लिए LASTEC के टेट्रा व्हीकल्स का उपयोग किया जा रहा है जिसके पीछे एक विशालकाय आर्टिलरी गन जैसी कोई डिवाइस लगी है और जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है, KALI यानि Kilo Ampere Linear Injector.

KALI को देखते ही R&AW का वह ऑफिसर इतना उत्सुक हो जाता है कि मानो उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसी डिवाइस देखी हो। R&AW का वह ऑफिसर KALI के बारे में जानने के लिए LASTEC के वैज्ञानिकों से बात करने लगता है, LASTEC के वैज्ञानिक ऑफिसर को बताते हैं कि असल में वह आर्टिलरी गन जैसी दिखने वाली डिवाइस जिस पर KALI लिखा है, एक लेजर गन है जिसकी मदद से टनल पर जमी बर्फ में छोटे-छोटे हिमस्खलन लाकर बर्फ को हटाया जाएगा।

R&AW का वह ऑफिसर वैज्ञानिकों के इस बात को सुनकर आश्चर्यचकित हो जाता है, और सोचने लगता है कि क्या इस तकनीक का उपयोग युद्ध के क्षेत्र में किया जा सकता है या नहीं?, यही इससे छोटे-छोटे अवालांच लाए जा सकते हैं तो क्या इससे बड़े अवालांच लाए जा सकते हैं?

इस प्रकार कश्मीर से दिल्ली आते ही वह ऑफिसर अपने सीनियर्स को इस तकनीक के बारे में बताता है, लेकिन उसके सीनियर्स उस तकनीक को बेकार बताकर रिजेक्ट कर देते हैं, पर R&AW का वह ऑफिसर हार नहीं मानता और कई महीनों तक LASTEC और SAS यानि snow avalanche study establishment के साथ रिसर्च करने के बाद डिटेल प्रेजेंटेशन तैयार करता है और उस समय के R&AW के चीफ “संजीव त्रिपाठी” तक पहुंचा देता है।

एनएसए एम.के. नारायणन और रॉ प्रमुख संजीव त्रिपाठी

संजीव त्रिपाठी इस तकनीक को मान जाते हैं और उस वक्त के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर एम. के. नारायणन से बात करते हैं, उस समय NSA एम. के. नारायणन और R&AW चीफ संजीव त्रिपाठी बहुत अच्छे मित्र थे, इसलिए संजीव त्रिपाठी को NSA को यह बात समझाने और उन्हें मनाने में ज्यादा समय नहीं लगा।

कई दिनों के मेहनत के बाद NSA एम.के. नारायणन उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी मना लेते हैं और इस प्रकार प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाती है। और NSA एम.के. नारायणन को इस प्रोजेक्ट का हेड नियुक्त किया जाता है।

प्रोजेक्ट “Operation Whitewash” की शुरुआत

यहां से शुरुआत होती है प्रोजेक्ट के टीम को बनाने की प्रोजेक्ट के टीम को R&AW, डीआरडीओ के LASTEC, इंडियन आर्मी और इंडियन एयरफोर्स से चुना जाता है, और प्रोजेक्ट को नाम दिया जाता है “ऑपरेशन वाइटवॉश“। इसी दौरान R&AW और SAS के ऑफिसर्स 20,000 फीट ऊपर स्थित सियाचिन में इंडियन आर्मी के आर्मी बेस का दौरा करते हैं जहां से पाकिस्तान आर्मी के नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेड क्वार्टर साफ-साफ दिखाई देता है।

SAS के वैज्ञानिक पूरे एरिया की मैपिंग करके ऐसे ट्रिगर पॉइंट्स को चुनती है, जिससे कि एक्सपेरिमेंट के बाद पूरा का पूरा एरिया बर्फ के नीचे दब जाए और पाकिस्तान को एक भी सबूत ना मिले। ट्रिगर पॉइंट्स को चुनना और पूरे प्रोजेक्ट की प्लानिंग पेपर पर हो चुकी थी, लेकिन LASTEC के वैज्ञानिकों के सामने कुछ चुनौतियां थी, पहली चुनौती यह थी कि 10 टन से भी ज्यादा भारी KALI गन और उसको पावर देने वाली जनरेटर को 20000 फीट ऊपर सियाचिन में ले जाना, और दूसरा अगर KALI का प्रयोग जमीन पर किया गया, तो इसके वाइब्रेशन और आवाज से इसके आसपास की बर्फ धस सकती है जिससे कि KALI के पास मौजूद सभी ऑफिसर और वैज्ञानिक मारे जा सकते हैं।

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इसलिए निर्णय लिया जाता है कि KALI का प्रयोग जमीन पर नहीं बल्कि एयर प्लेटफार्म यानी कि आसमान से किया जाएगा और जिसके लिए R&AW का एविएशन रिसर्च विंग (ARC), इंडियन आर्मी के दो विशालकाय प्लेन il-76 का उपयोग किया जाएगा।

दोनों il-76 प्लेंस को cattuck में मौजूद ARC के एयरबेस पर लाया जाता है जहां पर उन प्लेंस में KALI 50000w laser weapon को लगाया जाता है। यह KALI 50000w लेजर वेपन उस KALI gun से कई गुना शक्तिशाली थी जिसे R&AW के ऑफिसर ने जवाहर टनल पर देखा था।

दोनों il-76 प्लेंस में काली को लगाने के बाद इन दोनों प्लेंस को sarsawa एयर फोर्स स्टेशन पर ले जाकर पार्क कर दिया जाता है, जहां इनकी सुरक्षा के लिए इंडियन एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो को तैनात कर दिया जाता है। इधर इंडियन आर्मी के सियाचिन पोस्ट पर एक ऑब्जरवेशन टीम पहले से ही मौजूद थी, जिन्हें हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग दिया गया था।

प्लान के अनुसार सब कुछ करने के बाद ऑपरेशन वाइटवॉश के लिए d-day चुना जाता है, 7 अप्रैल 2012 दोपहर के 12:00 बजे, इस ऑपरेशन के लिए दोपहर का समय इसलिए चुना जाता है, क्योंकि सियाचिन में ज्यादातर नेचुरल हिमस्खलन दोपहर के समय ही आते हैं, लेकिन क्योंकि यह ऑपरेशन दोपहर के समय एयर प्लेटफार्म से होना था, इसलिए polarisation और high-precision शूटिंग जैसे तकनीकी समस्या आ रहे थे, जिसे सुलझाने के लिए भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों की सहायता ली जाती है।

वैज्ञानिक प्रोजेक्ट की स्टडी करके सुझाव देते हैं कि इस ऑपरेशन को सुबह किया जाए या फिर शाम को उनके अनुसार इन तकनीकी समस्याओं का एकमात्र यही रास्ता था। प्रोजेक्ट के सभी लोग भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसार ऑपरेशन के समय को बदल कर सुबह के 4:00 बजे कर देते हैं। अब Operation whitewash 7 अप्रैल 2012 को सुबह 4:00 बजे होना था।

इस प्रकार डी-डे के दिन काली से लैस दोनों il-76 प्लेंस saraswa एयर बेस से उड़ान भरते हैं और सियाचिन में पहले से ही निर्धारित coordinates पर अपनी-अपनी पोजीशंस ले लेते हैं। इनके साथ साथ इंडियन एयर फोर्स का एक एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी airbak प्लेन और रिफिलिंग के लिए एक il-78 प्लेन भी इनके पीछे पोजीशन ले लेते हैं।

ऑपरेशन के दौरान किसी भी तरह के सिचुएशन के लिए सुबह के 2:00 बजे से ही, 6 मिराज फाइटर जेट और दो सुखोई फाइटर जेट पहले से ही il-76 प्लेन के आसपास के एरिया को स्कैन करना शुरू कर चुके थे। इधर SAS के वैज्ञानिकों की एक टीम सेटेलाइट डाटा रिसेप्शन सेंटर और 3D terrain visualisation centre से मिली डाटा को विश्लेषक करने के बाद trigger points mark कर चुकी थी।

सभी वैज्ञानिक और R&AW के ऑफिसर और NSA आपस में कोआर्डिनेशन बनाए हुए थे और लगातार प्रोजेक्ट प्रोग्रेस और इंफॉर्मेशन प्रोजेक्ट के head, NSA Mk Narayanan तक पहुंचा रहे थे।

7 अप्रैल के सुबह के चार बजते ही iL-76 प्लेन में लगी kali gun 30,000 फीट की ऊंचाई से trigger points पर 100 % precision से laser shooting शुरू कर देती है। कुछ समय बाद सुबह के लगभग 5:40 पर सियाचीन में observation team को हिमस्खलन की आवाजें सुनाई देती है, पाकिस्तान के नॉर्दन लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर पर हिमस्खलन शुरु हो चुका था, जिसकी तेज़ी लगभग 3000 किलोमीटर प्रतिघंटा थी।

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पाकिस्तान आर्मी इस avalanche को देखते ही अपने आर्मी के जवानों को अलर्ट करने की कोशिश करता है, लेकिन 3000 किलोमीटर प्रति घंटे की तेजी से गिरती हजारों टन बर्फ उनको कोई मौका नहीं देती। 10 से 15 मिनट में ही पाकिस्तान आर्मी का पूरा का पूरा हेड क्वार्टर 80 से 100 फीट मोटी बर्फ के नीचे दब जाता है।

पाकिस्तानी आर्मी के अनुसार इसमें उनके 124 फौजी मारे गए थे, लेकिन इंडियन आर्मी के अनुसार इसमें पाकिस्तानी आर्मी के 130 से भी ज्यादा जवान मारे गए थे। पाकिस्तान आर्मी के अनुसार नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर के ऊपर 80 फीट मोटी बर्फ की परत जम गई थी जिसे बड़े-बड़े डिगिंग मशीन भी नहीं हटा सकते।

काली के इस विनाशकारी दृश्य को देखकर डीआरडीओ के वैज्ञानिक भी भयभीत हो गए थे। ऑपरेशन वाइटवॉश siachen में पाकिस्तान के नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री हेडक्वार्टर के लिए एक बहुत बड़ा विनाश था, जिसे पाकिस्तान कभी भुला नहीं पाएगा।

निष्कर्ष

ऑपरेशन वाइटवॉश की सफलता के बाद से, DRDO ने भारतीय सेना के लिए KALI का एक छोटा कॉम्पैक्ट मॉडल विकसित किया है, जिसे भारतीय सेना किसी भी युद्ध की स्थिति में उपयोग कर सकती है। किल्लो एम्पीयर रैखिक इंजेक्टर यानि रेखीय इलेक्ट्रॉन त्वरक, जिसपर रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा विकास और रीसर्च जारी है।

हालाँकि 14 जुलाई 2018 को संसद ने सरकार से पूछा कि क्या सशस्त्र बलों में KALI 5000 को शामिल करने का कोई प्रस्ताव है, तो भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने लोकसभा में लिखित में जवाब दिया कि, “वांछित सूचना प्रकृति में संवेदनशील है और इसका खुलासा राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है” सरकार ने KALI लेजर हथियार के परीक्षण की कोई भी जानकारी देने से भी इनकार कर दिया।

गायरी सेक्टर का हिमस्खलन सियाचिन में पाकिस्तान के उत्तरी लाइट इन्फैंट्री मुख्यालय के लिए एक बड़ा विनाश था; वह पाकिस्तान कभी नहीं भूलेगा। यदि ऑपरेशन वाइटवॉश एक साजिश नहीं है, लेकिन एक अत्यंत गोपनीय और गुप्त ऑपरेशन है तो यह DRDO, SAS, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, R&AW, और भारतीय सेना के वैज्ञानिकों और अधिकारियों के लिए एक बड़ी सफलता थी।


स्रोत

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  • Discussion in ‘Indian Defence Forum'(https://defence.pk/pdf/forums/indian-defence-forum.52/) started by Rangila(https://defence.pk/pdf/members/rangila.145044/), Jun 28, 2015. “When a terrifying new weapon was born”(https://defence.pk/pdf/threads/when-a-terrifying-new-weapon-was-born.383172/). Accessed 09 January 2020.
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इस लेख के प्रकाशन की तिथि: 13 जनवरी, 2020 और अंतिम संशोधित(modified) तिथि: 2 नवम्बर, 2020

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