मौसम युद्ध का कलात्मक चित्रण।
चित्र 1: बादल और गरज के साथ बारिश कर रहा सेना का एक खुफिया अधिकारी। | मौसम युद्ध का कलात्मक चित्रण।

जैसे-जैसे दुनिया पर्यावरण की नाजुकता से अवगत होती जा रही है, वैसे-वैसे इसे युद्ध के हथियार के रूप में संशोधित करने के लिए और अधिक विविध और जटिल तरीके विकसित किए जा रहे हैं। अब परमाणु युद्ध से अधिक विनाशकारी हथियारों का एक नया वर्ग क्षितिज पर है। जिसका विकास दुनिया की जलवायु और मौसम प्रणालियों को युद्ध के हथियारों में बदल सकता है। इसका उद्धरण है, ऑपरेशन पोपेय जिसका लक्ष्य दक्षिण पूर्व एशिया में मानसून के मौसम का विस्तार करना था।

कैप्टन ऑरविल ने आगाह किया था कि “यदि इससे पहले कोई दुश्मन राष्ट्र मौसम नियंत्रण की समस्या को हल कर लेता है और हमारे सामने बड़े पैमाने पर मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने की स्थिति में आ जाता है, तो प्रभाव परमाणु संघर्ष से भी अधिक विनाशकारी हो सकते हैं”। इस लेख में, हमने युद्ध में मौसम संशोधन तकनीक की गहन चर्चा की है, और युद्ध की इस तकनीक का उपयोग किसी भी देश को आर्थिक, सामरिक, रणनीतिक और गुप्त रूप से नष्ट करने के लिए कैसे किया जा सकता है, इसपर भी प्रकाश डाला है। जानिए इस लेख मे।

मौसम युद्ध क्या है?

मौसम युद्ध आधुनिक युद्ध तरीकों मे एक ऐसा युद्ध तरीका है जिसमे मौसम संशोधन और जियोइंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग करके मौसम मे उद्देश्यपूर्ण ढंग से बदलाव लाया जाता है, ताकि उस मौसम का उपयोग इस प्रकार किया जा सके कि दुश्मन राष्ट्र को युद्ध मे आर्थिक, सामरिक, रणनीतिक और गुप्त तरीके से हराया जाए, और जितना संभव हो उतना नुकसान पहुंचाया जाए। इस परिस्थिति मे दुश्मन खराब मौसम के कारण युद्ध नहीं लड़ पाता। मौसम युद्ध तकनीक का सबसे सामान्य रूप क्लाउड सीडिंग है, जिसका उपयोग बारिश या बर्फ को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। युद्ध में मौसम संशोधन का उपयोग इसलिए किया जा सकता है क्योंकि यह एक सामरिक हथियार, एक रणनीतिक हथियार या दुश्मन राज्य की भलाई को कमजोर करने का एक गुप्त तरीका है।

कई मायनों में सैन्य मौसम संशोधन तकनीक और मौसम नियंत्रण कार्यक्रम समान हैं। गर्म और सुपर-कूल्ड कोहरे को हटाने, बादल के आवरण को बदलने, वर्षा (बारिश या हिमपात) बढ़ाने, बिजली में हेरफेर करने और तूफान और अन्य गंभीर तूफानों को बनाने की तकनीकों पर सभी का ध्यान गया है। प्रदूषकों को वातावरण में डालने, बर्फ पर लैम्पब्लैक फैलाने, बर्फीले तूफान बनाने के लिए जमे हुए कार्बन डाइऑक्साइड को बादलों में छोड़ने और ओजोन के क्षरण का प्रभाव, प्रयोग और गणना सभी के साथ की गई है।

सामरिक रूप से, इसका उपयोग निम्नानुसार किया जा सकता है:

  • तत्काल हथियार के रूप में
  • एक हमले की सहायता में
  • अन्य हथियारों के संयोजन के साथ
  • अपने स्वयं के बलों और बुनियादी ढांचे की व्यापक लड़ाई की रक्षा के लिए।

रणनीतिक रूप से इसका इस्तेमाल किसी दुश्मन को उसकी सेना के स्रोत पर हमला करने के लिए किया जा सकता है। इससे दुश्मन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे।

गुप्त रूप से यह दुश्मन के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है, कृषि को नष्ट कर सकता है और संचार नेटवर्क को अक्षम कर सकता है।

मौसम संशोधन का परीक्षण करने के लिए प्रयोग

1924 में, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. एमोरी लियोन चाफ़ी ने मौसम को संशोधित करने के प्रयास में, एक हवाई जहाज से चार्ज की गई रेत को बादलों पर गिराया था। 1930 में W. Veraart ने मौसम बदलने के प्रयास में सूखी बर्फ को बादलों में गिराया था। उनकी तकनीक और परिणाम स्पष्ट रूप से केवल उनकी पुस्तक में प्रकाशित हुए थे, जो डच भाषा में थी। एमआईटी के प्रो. हेनरी जी. ह्यूटन ने कोहरे को दूर करने के लिए 1938 में कोहरे में हाइग्रोस्कोपिक घोल का छिड़काव किया था।

13 नवंबर, 1946 को, जनरल इलेक्ट्रिक रिसर्च लेबोरेटरी में काम कर रहे एक पायलट कर्टिस टैलबोट और एक वैज्ञानिक डॉ. विंसेंट जे. शेफर ने न्यूयॉर्क के शेनेक्टैडी से लगभग 30 मील पूर्व में 14,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरी। मौसम नियंत्रण का प्रयोग करने के लिए उन्होंने तीन पाउंड सूखी बर्फ (जमे हुए कार्बन डाइऑक्साइड) को बादलों में फेंक दिया, नतीजों से वे चौंक गए।

जैसे ही वे दक्षिण की ओर मुड़े, डॉ. शेफ़र ने देखा और कहा, “मैंने पीछे की ओर देखा और बादल के आधार से बर्फ की लंबी धाराएं गिरते हुए देखकर रोमांचित हो गया, जिसके माध्यम से हम अभी-अभी गुजरे थे। मैं चारों ओर घूमने के लिए कर्ट को चिल्लाया, और जैसे ही हमने ऐसा किया हम चमकते बर्फ के क्रिस्टल के एक समूह से गुजरे! कहने की जरूरत नहीं है, हम काफी उत्साहित थे”। उन्होंने कृत्रिम बर्फबारी का निर्माण किया था या आप कह सकते हैं कि बर्फ़ीला तूफ़ान का निर्माण किया था।

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जनरल इलेक्ट्रिक रिसर्च लेबोरेटरी के प्रयोगों के बाद, यह महसूस किया गया कि मानव जाति अंततः युद्ध के लिए मौसम को विनियमित और संशोधित करने में सक्षम हो सकती है। जैसे-जैसे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव बढ़ता गया, मौसम नियंत्रण को एक संभावित हथियार माना जाने लगा, जो परमाणु हथियारों से भी अधिक विनाशकारी हो सकता है।

मौसम युद्ध का इतिहास

अगस्त 1953 में, अमेरिका में मौसम नियंत्रण पर राष्ट्रपति की सलाहकार समिति की स्थापना की गई थी। इसका घोषित लक्ष्य मौसम संशोधन विधियों की प्रभावशीलता का आकलन करना था और सरकार को उनमें किस हद तक भाग लेना चाहिए। ध्रुवीय बर्फ की टोपियों को पिघलाने और विनाशकारी बाढ़ को दूर करने के लिए रंगीन पिगमेंट का उपयोग करना, मांग पर वर्षा बनाने के लिए बड़ी मात्रा में धूल को समताप मंडल(stratosphere) में छोड़ना आदि।

एक रूसी इंजीनियर अर्कडी बोरिसोविच मार्किन द्वारा बेरिंग जलडमरूमध्य(Bering Straits – बेरिंग जलडमरूमध्य प्रशांत और आर्कटिक महासागरों के बीच एक जलडमरूमध्य है, जो रूस के सुदूर पूर्व के चुकची प्रायद्वीप को अलास्का, अमेरिका के सीवार्ड प्रायद्वीप से अलग करता है।) एक बांध का प्रोजेक्ट भी डिजाइन किया गया था जिसमें हजारों परमाणु-संचालित पंप लगे होंगें। जो सैद्धांतिक रूप से न्यूयॉर्क और लंदन जैसी जगहों पर तापमान बढ़ाते हुए प्रशांत महासागर के पानी को मोड़ देगा। हालांकि मार्किन का घोषित लक्ष्य “उत्तरी गोलार्ध की अत्यधिक ठंड से राहत” देना था, अमेरिकी विशेषज्ञ चिंतित थे कि बाढ़ पैदा करने के लिए मौसम नियंत्रण का उपयोग किया जा सकता है। 1950 के दशक के मध्य में अमेरिकी और सोवियत दोनों वैज्ञानिकों द्वारा परिकल्पित सभी तरीकों पर मीडिया में खुले तौर पर चर्चा की जाती थी।

ऑपरेशन पोपेय एक उच्च वर्गीकृत अमेरिकी सैन्य अभियान था जो 1967 से 1972 तक चला। इसका लक्ष्य दक्षिण पूर्व एशिया में मानसून के मौसम का विस्तार करना था। मूसलाधार बारिश ने वियतनामी सेना की सामरिक रसद को सफलतापूर्वक बाधित कर दिया। कहा जाता है कि युद्ध में मौसम संशोधन तकनीक का पहला प्रभावी उपयोग ऑपरेशन पोपे के दौरान हुआ था, इस बात के खुलासा होने पर एनवायर्नमेंटल मैनिपुलेशन कन्वेंशन(ENMOD) दुआ युद्ध में मौसम संशोधन के उपयोग पर रोक लगा दिया गया।

वायु सेना के मेजर बैरी बी. कोबल ने मार्च 1997 में जारी “सौम्य मौसम संशोधन” में मौसम संशोधन तकनीक के अस्तित्व का संक्षेप में वर्णन किया है, जहां उन्होंने उन प्रगति का पता लगाया है, जो विशेष रूप से पेंटागन और सीआईए के कट्टर वैचारिक विरोधियों के हाथों में हुई हैं। आप उस पेपर को इस लिंक पर पढ़ सकते हैं – Benign Weather Modification PDF.

1948 में मौसम विज्ञान समुदाय ने मौसम में हेरफेर के रूप में पहले वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित और निगरानी के प्रयास को स्वीकार किया। डॉ. इरविंग लैंगमुइर के शुरुआती प्रयोगों ने बारिश उत्पन्न करने के लिए जानबूझकर बादलों को सीड करने के अच्छे परिणाम दिए जिससे इस क्षेत्र में लगभग तुरंत ही बहुत रुचि पैदा हो गई।

1990 के दशक में अमरीकी वायु सेना के चीफ ऑफ स्टाफ रोनाल्ड आर. फोगलमैन ने विचारों, क्षमताओं और प्रौद्योगिकी का मूल्यांकन करने के लिए एक आदेश जारी किया कि भविष्य में संयुक्त राज्य अमेरिका को प्रमुख वायु और अंतरिक्ष बल बनने की आवश्यकता होगी।

संयुक्त राज्य वायु सेना के लिए प्रकाशित 1996 की एक शोध रिपोर्ट में “कृत्रिम मौसम” बनाने के लिए नैनोतकनीक के भविष्य के उपयोग पर अनुमान लगाया गया है, जो एक कृत्रिम कोहरे” उत्पन्न करने के लिए सूक्ष्म कंप्यूटर कणों के बादल जो एक-दूसरे के साथ सम्पर्क कर सकते हैं, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के लिए किया जा सकता है। हालांकि, जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते जायेंगे, उनके संभावित अनुप्रयोगों का महत्व तेजी से बढ़ता रहेगा। वायु सेना अधिकारी-कैडेट ने छात्रों द्वारा निर्मित एक अवर्गीकृत अकादमिक पेपर में मौसम संशोधन प्रौद्योगिकी को अत्यधिक क्षमता वाला एक बल गुणक के रूप में परिभाषित किया है, जो युद्ध-लड़ाई की स्थिति की पूरी श्रृंखला में उपयोग किया जा सकता है।

मौसम संशोधन तकनीक जिसका उपयोग मौसम युद्ध में किया जा सकता है

दुनिया भर के कई देशों में आज भी मौसम में हेरफेर करके उसे युद्ध के लिए कैसे उपयोग मे लाया जाये इसके लिए कई अभ्यास और प्रयोग किए जाते हैं, उदाहरण के लिए ओलों को नियंत्रित करने के साधन के रूप में रूसी लंबे समय से मौसम संशोधन मे प्रयोग कर रहे हैं। चीन बारिश लाने के लिए क्लाउड सीडिंग का भी इस्तेमाल करता रहा है।

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साजिश सिद्धांतकारों के अनुसार, मौसम संशोधन, जियोइंजीनियरिंग, केमट्रेल, और हाई-फ़्रीक्वेंसी एक्टिव ऑरोरल रिसर्च प्रोग्राम – HAARP और अन्य विचार वैज्ञानिक बुनियादी ढाँचे या शोध नहीं हैं, बल्कि आधुनिक सैन्य हथियार हैं जिनका इस्तेमाल दुश्मन पर वार करने के लिए मौसम युद्ध में किया जा सकता है।

मौसम नियंत्रण युद्ध में परमाणु बम जितना प्रभावी हो सकता है

नोबेल पुरस्कार विजेता, भौतिक विज्ञानी और रेनमेकिंग में अग्रणी डॉ. इरविंग लैंगमुइर के अनुसार, “वर्षा निर्माण या मौसम नियंत्रण उतना ही प्रभावी हो सकता है युद्ध में परमाणु बम के रूप में “। इन्होंने जनरल इलेक्ट्रिक रिसर्च लेबोरेटरी के लिए किए गए उन शुरुआती प्रयोगों के दौरान डॉ. विंसेंट जे. शेफ़र के साथ काम किया था। लैंगमुइर ने टिप्पणी की कि आदर्श परिस्थितियों में 30 मिलीग्राम सिल्वर आयोडाइड का प्रभाव ऊर्जा मुक्त होने के मामले में एक परमाणु बम के बराबर होता है।

लैंगमुइर ने आगे कहा कि “सरकार को मौसम नियंत्रण की घटना को उसी तरह से समझना चाहिए जैसे उन्होंने परमाणु ऊर्जा को समझा था जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1939 में राष्ट्रपति रूजवेल्ट को परमाणु-विभाजन हथियार की संभावित शक्ति के बारे में चेतावनी दी थी”। मौसम नियंत्रण पर लैंगमुइर के उद्धरण 11 दिसंबर, 1950 को चार्ल्सटन डेली मेल में एक संक्षिप्त लेख में प्रकाशित हुए थे।

अमेरिका के मौसम नियंत्रण पर 1953 की राष्ट्रपति की सलाहकार समिति के अध्यक्ष कैप्टन हॉवर्ड टी. ऑरविल के अनुसार, “दक्षिण-पूर्व टेक्सास में एक मौसम केंद्र अपनी रडार स्क्रीन पर वाको की ओर बढ़ते हुए एक खतरनाक बादल के गठन को देखता है; बादल का आकार एक बवंडर को इंगित करता है। हो सकता है निर्माण हो रहा हो। मौसम नियंत्रण मुख्यालय को एक तत्काल चेतावनी भेजी जाती है। वापस विमान के लिए बादल को नष्ट करने का आदेश आता है। और एक घंटे से भी कम समय के बाद पहली बार बवंडर देखा गया था, विमान रेडियो वापस: मिशन पूरा हुआ। तूफान था टूट गया; कोई जीवन का नुकसान नहीं हुआ, कोई संपत्ति क्षति नहीं हुई। अपनी प्रारंभिक अवस्था में एक बवंडर का यह काल्पनिक विनाश आज शानदार लग सकता है, लेकिन यह अच्छी तरह से 40 वर्षों के भीतर एक वास्तविकता बन सकता है। एच-बम और सुपरसोनिक उड़ान के इस युग में , यह बहुत संभव है कि विज्ञान न केवल शुरुआती बवंडर और तूफान को खत्म करने के तरीके खोजेगा, बल्कि हमारे सभी मौसमों को एक हद तक प्रभावित करेगा जो कल्पना को डगमगाता है। मौसम नियंत्रण के लिए सार्वजनिक समर्थन और अनुसंधान के लिए धन प्राप्त होता है, जो इसके महत्व के योग्य है, हम अंततः मौसम को लगभग व्यवस्थित करने में सक्षम हो सकते हैं “

कोलियर की पत्रिका के कवर पर एक व्यक्ति को लीवर और पुश-बटन की एक प्रणाली के साथ मौसम बदलते दिखाया गया था। परमाणु बम और सुपरसोनिक उड़ान के युग में, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यह भी विश्वसनीय दिखाई दिया, जैसा कि इस पर प्रकाश डाला गया। 28 मई, 1954 को कवर आलेख के लेखक कैप्टन ऑरविल थे।

निष्कर्ष

मौसम को उद्देश्यपूर्ण ढंग से बदलने और उसे युद्ध के लिए प्रयोग करना एक अमानवीय युद्ध तरीका है, लेकिन, अगर एक अमित्र राष्ट्र मौसम नियंत्रण की समस्या को हल करता है और बड़े पैमाने पर मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने की स्थिति में आता है, तो परिणाम परमाणु युद्ध से भी अधिक विनाशकारी हो सकते हैं, जैसा कि कैप्टन ऑरविल कहते हैं, तो ऐसे परिस्थिति मे दुनिया भरके देश मौसम युद्ध मे महारत हासिल करने के लिए प्रयोग तो करेंगे ही। कई साजिश सिद्धांतकारों के अनुसार अमेरिका तो इसमें महारत हासिल कर चुका है जिसके कारण रूस, और चीन भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहता।

हमारे अनुसार मौसम एक प्राकृतिक प्रणाली है जो पृथ्वी के रोटेशन, चंद्र, सूर्य के कारण समुद्र मे बदलाव के कारण प्राकृतिक रूप से बनता और बदलता है, इसमें किसी भी प्रकार का मानवीय संसोधन बहुत बुरे परिणाम ला सकते हैं। कई मायनों में इससे दुश्मन देश पूरी तरह से नस्ट हो सकता है जिससे वो देश फिर कभी न उभर पाए। मौसम युद्ध एक बहुत ही विनाशकारी युद्ध प्रणाली है जिसपर दुनिया भर के देशों को मिलकर विचार करना चाहिए और इसके रेगुलेशन के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।


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