सिमुलेशन सिद्धांत: वास्तविकता की सभी संभावनाएं कृत्रिम सिमुलेशन हैं

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हमारे सिमुलेशन में रहने वाले अनुभवों के साथ हमारे नकली स्व की कलात्मक चित्रण।
चित्र 1: हमारे सिमुलेशन में रहने वाले अनुभवों के साथ हमारे नकली स्व की कलात्मक चित्रण। | निक बोस्सोम का तर्क है कि यदि "हमारे सभी प्रकार के अनुभव वाले लोगों का अंश जो सिमुलेशन में रह रहे हैं, एक के बहुत करीब हैं", तो यह इस प्रकार है कि हम शायद एक सिमुलेशन में रहते हैं।

क्या ब्रह्मांड एक Computer Simulation है?, क्या सिमुलेशन सिद्धांत(Simulation Theory) का प्रस्ताव है?, क्या पृथ्वी और ब्रह्मांड सहित वास्तविकता के सभी पहलू, वास्तव में एक कृत्रिम सिमुलेशन है? क्या आपकी वास्तविकता एक जटिल कंप्यूटर सिमुलेशन है? क्यों कुछ भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि भौतिक पदार्थ वास्तविक नहीं है? किन वैज्ञानिक प्रयोगों ने वास्तविकता के बारे में हमारे दृष्टिकोण बदल दिए हैं? क्या हम जो कुछ भी देखते हैं वह बस एक कंप्यूटर सिमुलेशन है वास्तविकता नहीं? इस लेख में जानिए सभी जवाब।


Computer Simulation Theory की परिभाषा

सिमुलेशन परिकल्पना या सिमुलेशन सिद्धांत(Simulation Theory) का प्रस्ताव है कि, पृथ्वी और ब्रह्मांड सहित वास्तविकता के सभी पहलू, वास्तव में एक कृत्रिम सिमुलेशन है, सबसे अधिक संभावना है कि कंप्यूटर सिमुलेशन(Computer Simulation)। कुछ संस्करण एक सिम्युलेटेड वास्तविकता के विकास पर निर्भर करते हैं, एक प्रस्तावित तकनीक जो अपने निवासियों को यह समझाने के लिए पर्याप्त यथार्थवादी होगी कि सिमुलेशन वास्तविक था।

महान फिलोसोफर रेने डेसकार्टेस कहते थे ”मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं”। वे एक ऐसे सत्य की खोज मे थे जिसपर विवाद न किया जाए, और सोचने का कार्य व्यक्ति के अस्तित्व का निर्विवाद प्रमाण हो। फिर भी, अस्तित्व और वास्तविकता के बारे में हमारी समझ अभी भी विकसित हो रही है, इसलिए कंप्यूटर सिमुलेशन के quantum physics और neuroscience और फिलॉसफी की दुनिया में अलग-अलग सिद्धांत और परिभाषाएं हैं।

इतिहास

1801 में भौतिक विज्ञानी थॉमस यंग द्वारा डबल-स्लिट प्रयोग में सुपरपोजिशन का विचार प्रस्तावित किया गया था। जब हम एक स्लिट के माध्यम से प्रकाश के किरणों को पार कराते हैं, तो यह प्रकाश की एक अपेक्षित रेखा उत्पन्न करता है। जैसा कि होना भी चाहिए। लेकिन, जब प्रकाश के किरणों को डबल-स्लिट के माध्यम से पार कराया जाता है, तो कुछ अजीब होता है। प्रकाश की दो रेखाओं के बजाय, हमें कई रेखाएं दिखती हैं। इससे पता चलता है कि फोटॉन particles यानि कणों के बजाय एक wave यानि तरंगों की तरह भी कार्य करते हैं, जैसे कि वे slits के माध्यम से तरंगित हो रहे हैं और एक दूसरे से अलग-अलग दिशाओं में बिखर रहे हैं। particles के इस पैटर्न ने वैज्ञानिकों को यह विश्वास दिलाया कि पदार्थ कणों और तरंगों दोनों के रूप में कार्य कर सकते हैं। यह एक महान खोज था जिसने भौतिकी की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।

1970 मे एक ब्रिटिश गणितज्ञ John Horton Conway ने एक प्रोजेक्ट बनाया था, जिसे Conway’s Game of Life के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास में और भी पीछे देखेें तो ग्रीक फिलोसोफर सुकरात का भी मानना था कि यह दुनिया असल दुनिया नहीं। भगवत गीता में भी इसका उल्लेख है जिसमें कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह संसार एक माया है। तो क्या वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड एक कंप्यूटर सिमुलेशन है, जानिए आगे –

गेम ऑफ लाइफ(Game of Life)

गेम ऑफ लाइफ(Game of Life) एक ऐसा प्रोग्राम है, जिसमें शुरुआत में आपको कुछ शर्तें डालने होते हैं और एक बार प्रारंभिक शर्तें डालने के बाद सिमुलेशन के नियमों का छोटा सा सेट चलने लगता है। जिसमें कुछ पैटर्न बस थोड़े समय तक चलते हैं और फिर गायब हो जाते हैं, गेम की भाषा में कहें तो मर जाते हैं, दूसरी तरफ कुछ पैटर्न हमेशा के लिए चलते रहते हैं। आज जो भी गेम आप खेलते हैं वह इसी कंप्यूटर सिमुलेशन के सिद्धांत पर बना है, ऐसे गेम जिसे हम अपने इच्छा अनुसार कंट्रोल कर सकते हैं।

A single Gosper's glider gun creating "gliders"
एक एकल गॉस्पर की glider gun “gliders” बना रही है।

तो क्या इस गेम की ही तरह कोई कंप्यूटर सिमुलेशन बहुत बड़ा परिणाम नहीं दे सकता एक ऐसा सिमुलेशन जो पूरे ब्रह्मांड के आकार का हो जो स्क्रीन पर केवल डॉट्स और पैटर्न ना हो बल्कि आकाशगंगाओं, ग्रहों और जीवन के साथ एक सिमुलेशन हो इससे भी महत्वपूर्ण बात कि कहीं हम ऐसे ही किसी सिमुलेशन में तो नहीं रह रहे, या यूं कहें जिस दुनिया में हम रह रहे हैं क्या वह असली है। अगर चीजें केवल तभी मौजूद होती हैं जब उन्हें देखा जाता है, तो क्या ब्लैक होल अभी भी मौजूद होंगे यदि हमने उनके एक्स-रे को नहीं मापा होता? मैक्स टेगमार्क जैसे कुछ भौतिकविदों का मानना है कि ब्लैक होल और जो कुछ भी हम वास्तविक समझते हैं वह केवल गणितीय जानकारी है। इस विचार को Information Realism के रूप में जाना जाता है। Philosophy की दुनिया में, वास्तविकता के हमारे अवलोकन का एक उत्पाद होने के इस विचार को Phenomenalism यानि घटनावाद के रूप में जाना जाता है। इसमें कहा गया है कि हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं वह हमारे दिमाग में केवल Sensory Data है, जैसे कि जीवन की आभासी वास्तविकता।

आधुनिक युग मे Computer Simulation Theory

यदि वैज्ञानिक सभी इंद्रियों का Simulation करते हुए, एक वेट में जीवित मस्तिष्क को संकेत भेजने में सक्षम हो, तो क्या हम मस्तिष्क को यह विश्वास कराने मे सफल होंगे कि वह एक मानव शरीर में है और वास्तविकता का अनुभव कर रहा है? हो सकता है कि हम अपनी वास्तविकताओं को Neural Level पर दोबारा प्रोग्राम कर सकें। कल्पना कीजिए कि आप कहीं भी उड़ान भरने में सक्षम हैं, फैंसी कार चला सकते हैं, और हमेशा के लिए एक सफल जीवन जी सकते हैं। आपकी खुशी, आपकी उपलब्धियां, और आपकी सफलता का स्तर केवल उनकी कल्पना करने की आपकी क्षमता से ही सीमित होगा। प्रोफेसर अनिल कुमार सेठ सहित कुछ Neuroscientists का सुझाव है कि हमारा दिमाग हर समय लगातार वास्तविकता को Hallucinate कर रहा है।

उद्धरण के लिए, क्या आपने कभी कोई ऐसा सपना देखा है जो इतना वास्तविक महसूस हुआ हो कि जागने के बाद भी खुद को भटका हुआ महसूस कर रहे हों? जैसा की मैंने एक बार खुद को Terminator Salvation Movie मे पाया और सपना टूटने के बाद जागते ही मै घर से बाहर भागने लगा। खैर, हमारे बुरे सपने और वास्तविकता की हमारी धारणा दोनों हमारे दिमाग के Visual Cortex में संसाधित होती हैं। यही कारण है कि उनके बीच अंतर बताना मुश्किल हो सकता है।

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आधुनिक युग में ऐसे बहुत से वैज्ञानिक सिद्धांत हैं जो यह साबित करते हैं कि हमारी दुनिया एक कंप्यूटर सिमुलेशन है और हम सब बायोलॉजिकल वस्तु नहीं बल्कि एक सिमुलेटेड प्रोग्राम है। ऐसे ही सिद्धांतों में से एक सबसे ज्यादा विख्यात “सिमुलेशन अरगुमेंट” है जिसे 2003 में फिलोसोफर निक बॉस्ट्रोम(Nick Bostrom) ने रखा था। उनके प्रस्ताव के अनुसार मानव जाति एक अधिक उन्नत सभ्यता के द्वारा बनाए गए कंप्यूटर सिमुलेशन का हिस्सा हो सकते हैं। इसके इलावा स्टीफन हॉकिंग भी सिमुलेशन थ्योरी को सच मानते थे। चलिए इसे और विस्तार से जानते हैं –

सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव वास्तविकता

आप किसी वस्तु को कैसे ऑब्जर्व करते हैं आप जरूर उन्हें देखकर छूकर या फिर अपने किसी भी सेंसस का उपयोग करके ऑब्जर्व करते हैं, यह आपका सब्जेक्टिव रियालिटी यानी व्यक्ति परक वास्तविकता है जिसमें सब्जेक्ट आप ही हैं जो किसी वस्तु या चीजों को observe कर रहा है। ठीक इसी प्रकार ऑब्जेक्टिव रियलिटी यानी वस्तुगत वास्तविकता वह वस्तु है जिसे आप ऑब्जर्व यानी निरीक्षण कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए अगर मैं घर के बाहर जाता हूं और महसूस करता हूं कि बाहर ठंड है और आप बाहर जाते हैं और महसूस करते हैं कि बाहर गर्मी है तो यहां सब्जेक्टिव रियालिटी यानी व्यक्तिपरख वास्तविकता यह है, कि दो अलग-अलग दिमाग दो अलग-अलग लोग एक ही वस्तु को कई तरीकों से देख सकते हैं और यहां ऑब्जेक्टिव रियालिटी यानी वस्तुगत वास्तविकता यह है कि बाहर या तो ठंडा होगा या गर्मी। हम दोनों को ही अपने-अपने ऑब्जरवेशन को साबित करने के लिए ऑब्जेक्टिव रियालिटी को ऑब्जर्व किए बिना ही ऑब्जर्व करना होगा जो कि एक स्पष्ट विरोधाभास है। ठीक इसी प्रकार क्या कोई वस्तु तब भी मौजूद होती है जब आप उन्हें देख नहीं रहे हो उदाहरण के लिए आप अपने कंप्यूटर या फोन या फिर जिस डिवाइस पर भी यह लेख पढ़ रहे हैं वह डिवाइस आप जानते ही हैं कि माइक्रोस्कोपिक लेवल पर परमाणुओं से बना है लेकिन आप वास्तव में उन एटम्स को नहीं देख सकते तब तक नहीं जब तक कि आप इसके ऑब्जरवेशन के लिए माइक्रोस्कोप उपकरण नहीं लेते।

आपने गेम में देखा ही होगा कुछ चीजें हमें तभी दिखती हैं जब वास्तव में उन्हें देखते हैं तो क्या यह सच नहीं हो सकता कि हम इंसानों को भी कोई वस्तु तभी दिखती है जब हम वास्तव में उसे देख या छू रहे हो इस बात को थॉमस यंग ने अपने डबल स्लित एक्सपेरिमेंट में साबित भी किया है।

दोस्तों जब भी हम किसी भी वस्तु या चीजों को ऑब्जर्व करते हैं तो हमारे सेंस ऑर्गन हमारे दिमाग को एक इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजता है जिसके आधार पर दिमाग हमें उस वस्तु का एहसास कराता है एक निश्चित तरीके से दुनिया के बारे में अपना दृष्टिकोण बनाने के लिए है दिमाग हमारे सेंसेस यानी इंद्रियों का उपयोग करता है। इसलिए हमारे दिमाग के पास इतनी क्षमता है कि यह हमें वास्तविकता को किसी भी प्रकार से दिखा सकता है, जैसे कि हमारे सपने जब हम सपना देख रहे होते हैं तो हमें लगता है कि सब कुछ वास्तव में है, हमें असल वास्तविकता के बारे में तभी पता चलता है जब हम जागते हैं।

दोस्तों अब तक हमने जाना कि कैसे सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव रियालिटी किसी वस्तु के होने या ना होने पर सवाल उठा सकता है अब चलिए कुछ ऐसे सिद्धांतों को जानते हैं जो सिमुलेशन थ्योरी को सच साबित करते हैं –

तरंग-कण द्वैत(Wave-particle duality)

यदि हम क्वांटम क्षेत्र में गहराई तक जाते हैं, तो हमें पता चलता है की matter subatomic particles से बना होता है, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉनों सहित ये कण तब तक तरंगों की स्थिति में रहते हैं जब तक कि वे observe नहीं किए जा रहें हो यानि देखे नहीं जा रहे हों। वास्तव में क्वांटम स्तर पर ये कणों की तरह बिल्कुल नहीं दिखई पड़ते। आप इन्हें संभावनाओं के बादल के रूप में सोच सकते हैं। इस अवधारणा को सुपरपोजिशन के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि एक कण कई संभावित स्थितियों में तब तक मौजूद रहता है जब तक कि उन्हें मापा नहीं जाता।

Fermi paradox

Fermi paradox के अनुसार जब हम ब्रह्मांड में दूर-दूर तक देखते हैं तो, हमें जीवन के कोई भी अन्य लक्षण क्यों नहीं दिखाई देते क्या हम ब्रह्मांड में वास्तव में अकेले हैं या हम दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने में पूरी तरह से प्रयास नहीं कर रहे हैं। क्या इस विशाल ब्रह्मांड में कोई भी ऐसी सभ्यता नहीं है जो इतनी विकसित हो कि वह हमें खोज सकें और हम तक पहुंच सके।

Anthropic principle

दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि पृथ्वी जीवन के लिए इतना उत्तम स्थान क्यों है, एंथ्रोपिक प्रिंसिपल(Anthropic principle) कहता है कि पृथ्वी पर सब कुछ इतना सटीक क्यों है। चाहे सूर्य से इसकी दूरी की बात करें या यहां के वातावरण की, या फिर ग्रेविटी की, क्या इन्हें ऐसा बनाया गया है।

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String theory

स्ट्रिंग थ्योरी(String theory) से बिग बैंक के पहले के समय को समझना आसान हो जाता है, और इसके अध्ययन से पता चला है कि ब्रह्मांड में कंप्यूटर कोड्स मौजूद हैं, जिससे यह लगभग साबित होता है कि यह ब्रह्मांड एक कंप्यूटर सिमुलेशन है।

Simulation Theory मे कमियां

सिमुलेशन चाहे कितनी भी परफेक्ट क्यों ना हो उसमें कुछ ना कुछ कमियां रह जाती है, जैसे कि

Deja Vu

“Deja Vu” यानी कि ऐसी स्थिति जब आपको कोई स्थान या व्यक्ति जाना पहचाना लगता है जबकि आप उस स्थान पर पहले कभी नहीं गए और उस व्यक्ति को पहले कभी नहीं देखा।

सुपरनैचुरल वस्तुएं या हमारे सपने

दूसरा उदाहरण है सुपरनैचुरल वस्तुएं या हमारे सपने सुपरनैचुरल वस्तुएं जैसे भूत प्रेत या आत्माएं जोकि सिमुलेशन के प्रोग्राम में किसी खराबी या बग के कारण दिख सकता है।

भगवान एक प्रोग्रामर

सिमुलेशन थ्योरी के अनुसार भगवान एक प्रोग्रामर हो सकता है जिसने इस ब्रम्हांड का निर्माण किया है, लेकिन सिमुलेशन थ्योरी साथ ही यह भी कहता है कि, भगवान ऐसा क्यों करेगा? हो सकता है भगवान या फिर प्रोग्रामर यह देखना चाहता हो कि कोई सभ्यता कैसे विकसित होती है। सिमुलेशन थ्योरी के अनुसार जिस भी व्यक्ति को सिमुलेशन में जीवन के अस्तित्व का पता चल जाता है, भगवान यानी प्रोग्रामर उसे प्रोग्राम से डिलीट कर देता है, उदाहरण के लिए वे सभी ऋषि मुनि जो तपस्या करते करते अपना शरीर त्याग देते हैं, या फिर वे सभी वैज्ञानि और लोग जिनका रहस्यमई तरीके से मृत्यु हो जाता है। सिमुलेशन थ्योरी के अनुसार अगर हमारी दुनिया एक कंप्यूटर सिमुलेशन है तो यह भी हो सकता है कि जिन्होंने हमारी दुनिया बनाई, हो सकता है उनकी दुनिया भी सिमुलेटेड हो, और यहां यह क्रम कहाँ तक है यह कह पाना संभव नहीं।

निष्कर्ष

दोस्तों मानव जाति अब तक इतना सक्षम हो गया है कि, वह किसी भी प्रकार का सिमुलेशन कंप्यूटर कोड्स और मैथमेटिकल समीकरण की सहायता से बना सकता है, और सिमुलेशन में मौजूद सभी प्रकार के जीवो को भी, लेकिन हम इन जीवो में ऐसे प्रोग्रामिंग नहीं कर सकते कि वे खुद सोचने समझने की क्षमता रखता हो। इसलिए विज्ञान में हर एक थ्योरी को साबित करने के लिए उसे मैथमेटिकल समीकरण में लिखना होता है क्योंकि पूरे ब्रह्मांड को नंबर्स और समीकरण से ही समझा जा सकता है।

हम वास्तविकता की जटिलताओं को समझने के करीब तो पहुंच चुके हैं लेकिन भौतिक विज्ञान और Neuroscience की दुनिया में इतने प्रगति के बाद भी यह सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं कि असल मे वास्तविक क्या है। हो सकता है कि हम किसी दिन इस मैट्रिक्स जिसमे हम रहते हैं, के कोड को क्रैक कर लें, लेकिन फिर क्या, क्या हम इससे भी ऊपर किसी मैट्रिक्स मे फसे होंगे या इस मैट्रिक्स को बनाने वाले एक अधिक उन्नत सभ्यता से मिलेंगे, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

आधुनिक युग में ऐसे बहुत से साइंटिफिक थ्योरी तो हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह ब्रह्माण्ड एक कंप्यूटर सिमुलेशन है, लेकिन अब तक ऐसी कोई भी गणितीय समीकरण नहीं है जो इसे गणितीय रूप साबित कर सके। जिस प्रकार यह कहना कठिन है कि यह ब्रह्मांड एक कंप्यूटर सिमुलेशन नहीं है, ठीक उसी प्रकार यह भी कहना कठिन है कि यह ब्रह्मांड एक कंप्यूटर सिमुलेशन है, तो दोस्तों अगर किसी दिन किसी वैज्ञानिक ने सिमुलेशन थ्योरी को गणितीय समीकरण द्वारा साबित कर पाया तो उम्मीद है, कि हमारा जीवन का यह खेल वह खेल होगा जिसे हम जीत सकते हैं।

अगर आपको सिमुलेशन थ्योरी के बारे में और भी जानना है तो आप इस लेख के रिसर्च पेपर्स पढ़ सकते हैं जिसका लिंक आपको नीचे मिल जाएगा इसके अलावा आप सिमुलेशन थ्योरी पर आधारित फिल्में जैसे कि द मैट्रिक्स,The Thirteenth floor और द इनसेप्शन जरूर देखें।

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कंप्यूटर सिमुलेशन पर वीडियो देखें।

Sources और Research Papers:

  1. The Objective Reality: http://www.ict.griffith.edu.au/joan/atheism/reality.php
  2. ARE YOU LIVING IN A COMPUTER SIMULATION? : https://www.simulation-argument.com/simulation.html
  3. Objectivity: https://www.iep.utm.edu/objectiv/
  4. http://www.illustris-project.org/media/

इस लेख के प्रकाशन की तिथि: 16 फ़रवरी, 2019 और अंतिम संशोधित(modified) तिथि: 2 अक्टूबर, 2021

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