लंदन का वह भयानक स्मॉग
चित्र 1: लंदन का वह भयानक स्मॉग | कार्ल मायडम्स / द लाइफ पिक्चर कलेक्शन | गेटी इमेजेज

The great smog of London – smog जिसने 12000 लोगों को मारा

प्रदूषण की समस्या आज मानव समाज के लिए एक सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है, जिसने भविष्य में जीवन के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाना शुरू कर दिया है। वैसे तो प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं, लेकिन वायु प्रदूषण का एक प्रकार जिससे हम smog के नाम से भी जानते हैं, आधुनिक युग में एक गंभीर समस्या बना हुआ है। यह कितना खतरनाक रूप ले सकता है आपने देखा ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 5 दिसंबर 1952 को लंदन में इसी प्रकार के smog जिसमें 12000 लोगों की मृत्यु हुई थी और उस smog के बनने के कारण को पता लगाने में वैज्ञानिकों को लगभग 64 वर्ष का समय लगा ।

हल्का काला अजीब और भयानक जैसे धुंध रंग, लंदन के मूल निवासियों ने पहले कभी नहीं देखा था, smog का गंध इतना रासायनिक और विषैला था कि लोगों के लिए घर से बाहर निकलना किसी चुनौती से कम नहीं था। यह सब कुछ 5 दिसंबर से कुछ दिन पहले शुरू हुआ, जब लंदन में सामान्य से ज्यादा सर्दी पड़ी जिसके कारण लोगों को अपने घर को गर्म रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा कोयला जलाना पड़ा नतीजतन सामान्य से ज्यादा धुआं वातावरण में घुल गया, अधिक ठंड और स्थिरता के कारण पूरे लंदन शहर में atmospheric anticyclonic जैसी परिस्थिति पैदा हो गई, जिसके कारण पूरे शहर को धुएं के विशाल बादल ने अपनी चपेट में ले लिया।

The great smog of London

गंभीर समस्याओं का सामना –

धुंध इतना ज्यादा था कि visibility लगभग ना के बराबर हो गई जिसके कारण लोगों ने सड़कों के बीच ही अपने वाहनों को छोड़ दिया। धुंध इतना ज्यादा हो गया था कि लोगों के लिए चलना तक मुश्किल था उस वक्त के जहरीले वातावरण के कारण लोगों को कई प्रकार के स्वास्थ्य प्रभावों का सामना करना पड़ा जिसमें respiratory infection, Hyperoxia, Bronchitis और ऐसे कई प्रकार के स्वास्थ्य प्रभावों के कारण लोगों की मृत्यु होने लगी, मौत की संख्या जल्द ही 12,000 तक पहुंच गई, बाद के एक अध्ययन से पता चला कि धुएं में सल्फ्यूरिक एसिड होने के कारण इतने पैमाने में लोगों की मृत्यु हुई, वास्तव में सल्फ्यूरिक एसिड वातावरण में आया कहां से यह 64 वर्षों तक एक रहस्य बना रहा।

वैज्ञानिकों के एक टीम ने इस रहस्य को सुलझाया –

नवंबर 2016 में वैज्ञानिकों के एक टीम ने इस रहस्य को सुलझाया, और दावा किया कि सल्फर डाइऑक्साइड ज्यादातर कोयला जलाने से उत्पन्न होता है लेकिन सल्फर डाइऑक्साइड सल्फ्यूरिक एसिड में कैसे बदला यह अभी भी एक प्रश्न था। बाद के वैज्ञानिक शोध में पता चला कि इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और प्रारंभिक प्राकृतिक धुंध से मदद मिली। लंदन के इस घटना ने UK के संसद को प्रदूषण पर कानून बनाने में मजबूर किया और UK ने 1956 में क्लीन एयर अधिनियम लागू किया जिसके अनुसार पूरे यूनाइटेड किंगडम में पूर्ण रूप से प्रदूषक जलाने पर प्रतिबंध लग गया वैज्ञानिक अब उम्मीद कर रहे हैं कि लंदन के ग्रेट स्मॉग पर उनके शोध से अन्य पर्यावरणीय सफलताएं होंगी और उच्च वायु प्रदूषण दर वाले देशों में समस्याओं को हल करने में मदद मिलेगी।

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Mithun Sarkar वैज्ञानिकों और लेखकों के बारे में आत्मकथाएँ लिखते हैं। उन्हें विज्ञान और तकनीक बहुत पसंद है। उन्हें विज्ञान लेख लिखने के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, वे व्यक्तिगत वित्त से लेकर खगोल विज्ञान तक के विषयों पर भी लिखते हैं।

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